गौतम बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व लुंबिनी(नेपाल) स्थित जगह कपिलवस्तु नाम के राज्य में हुवा था।गौतम बुद्ध के बचपन का नाम सिद्धार्थ था,सिद्धार्थ का अर्थ है-"वह जो सिद्धि प्राप्ति के लिये जन्म लिया हो"। बुद्ध के पिता का नाम शुद्धोधन था, जो शाक्य गण के मुखिया थे और शाक्य गण राज्यों के महाराजा थे।बुद्ध की माता का नाम महामाया (मायादेवी) था।
बुद्ध के जन्म के सात दिन बाद बुद्ध की माता महामाया का निधन हो गया,महामाया के निधन के बाद बुद्ध का लालन पालन शुद्धोधन की दूसरी पत्नी गौतमी(महाप्रजापति गौतमी) ने किया।बुद्ध का जन्म हुवा तब उनके नामकरण के समय महाराज शुद्धोधन एक बड़ा नामकरण समारोह रखा,उसमे बड़े बड़े ऋषि-मुनि गुरु,ज्योतिष विद्या के जानकार आये।उनके नामकरण समारोह के दौरान ऋषि आशित मुनि ने भविष्यवाणी की -"के ये बालक या तो एक बड़ा सम्राट राजा बनेगा या एक महान पवित्र ऋषि जो मानवता का कल्याण करेगा।बुद्ध के बारे में सभा मे आये ऋषि मुनियों की भविष्यवाणी के अनुसार,"ये बालक एक महान इंसान बनेगा,सिद्धार्थ को जीवन के कड़वे अनुभव होंगे तब सिद्धार्थ राजपाट का त्याग करके संन्यास धारण करके सिद्धि प्राप्त करने जंगल(अरण्य) चला जायेगा और महान धर्म की स्थापना करेगा । ऐसी भविष्यवाणी सुनकर पिता शुद्धोधन को अपने पुत्र सिद्धार्थ की बहोत चिंता हुई,क्योकि शुद्धोधन अपने पुत्र को एक सम्राट बनाना चाहते थे।शुद्धोधन को दिनरात चिंता सताती थी के गौतम बड़ा होकर संन्यासी न बन जाये।भविष्यवाणी के अनुसार यदि गौतम राजमहल में टीका रहा तो वो महान सम्राट राजा जरूर बनेगा।राजा शुद्धोधन सिद्धार्थ के लिए भोग विलास के भरपूर प्रबंध किए,तीन ऋतु के तीन सुंदर महल ,महलो में मनोरंजन की सारी सामग्री के साथ दासदासी गौतम की सेवा में रखी।सिद्धार्थ के गुरू विश्वामित्र थे,विश्वामित्र ने सिद्धार्थ को वेद,पुराण,उपनिषद के साथ अस्त्र शस्त्र, युद्ध कौशल विद्या शिक्षा दी।राजा शुद्धोधन ने सिद्धार्थ को संन्यासी बनने से रोकने लिए,सांसारिक मोहमाया में बाधे रखने के लिए कई प्रयत्न किए।सिद्धार्थ के पिता ने सिद्धार्थ को सभी दुखो ,पीड़ाओं से दूर रखा,लेकिन सिद्धार्थ बचपन से ही संवेदनशील और करुणामय व्यक्ति था,वे कभी किसी दुसरो का दुःख नही देख सकते थे,जिसके कारण सभी लोग उनसे बहुत प्रेम करते थे।शांकय वंश में जन्मे सिद्धार्थ का 16 वर्ष की आयु में राजा दंडपाणि की कन्या यशोधरा के साथ विवाह हुवा।सिद्धार्थ अब युवा हो गई थे, वे अब हर चीज को जानने को बड़े ही उत्सुक रहते थे।समय के साथ सिद्धार्थ की पत्नी यशोधरा को एक पुत्र हुवा,उनका नाम राहुल रखा।एक बार पहली बार सिद्धार्थ को अपने नगर राज्य के बाहर भ्रमण करने का विचार आया,उन्होंने राजा शुद्धोधन से पहली बार महल से बाहर भ्रमण करने के लिए अनुमति मांगी।जिसके बाद सिद्धार्थ अपने बचपन के मित्र सारथी चना के साथ भ्रमण पर निकल पड़े।सिद्धार्थ के लिए एक नया अनुभव होने जा रहा था।सिद्धार्थ के जीवन के रास्ते मे अब विविधता आने वाली थी ।सिद्धार्थ के पिता शुद्धोधन भी अपने पुत्र को रोक नही सकते थे,क्योकि सिद्धार्थ अब समझदार हो गया था।लेकिन सिद्धार्थ के पिता शुद्धोधन को ऋषि मुनियों की भविष्यवाणी हर वक्त याद रहती थी।लेकिन होनी को कौन टाल सकता है,गौतम सिद्धार्थ या तो सम्राट या तो महान ऋषि बनेगा।सिद्धार्थ जो पहली बार राजमहल से बाहर अपनी मर्जी से पिता की अनुमति से निकला है।सिद्धार्थ एक सुंदर रथ में सवार होकर अपने मित्र सारथी चना के साथ नगर यात्रा करने चल पड़ा।रास्ते मे सिद्धार्थ को नयी नयी चीज देखने मिली जो पहले सिद्धार्थ कभी देखी नही थी।सिद्धार्थ के लिए ये एक नया अनुभव था। रास्ते मे सिद्धार्थ को बडी उम्र का एक वृद्ध बुढा व्यक्ति मिला,सिद्धार्थ पहली बार वृद्ध व्यक्ति को देखा, सिद्धार्थ ने अपने सारथी मित्र को पूछा ये केैसा व्यक्ति है? तब सारथी मित्र ने कहा की ये एक वृद्ध व्यक्ति है,तब सिद्धार्थ ने कहा ये वृद्ध क्या होता है?तब सारथी मित्र ने कहा की हर व्यक्ति अपनी उम्र समय के अनुसार वृद्ध होता है,तब सिद्धार्थ ने सारथी मित्र से कहा क्या में भी वृद्ध बनुगा,तब सारथी मित्र ने कहा सभी व्यक्ति वृद्ध बनते है-जो जन्म लेता है वो जवान होता है और जो जवान होता है वो वृद्ध अवश्य होता है,ये एक कुदरत का नियम है,सिद्धार्थ अपने सारथी मित्र की बाते ध्यान से सुना और साथ मे आश्चर्य भी हुवा सिद्धार्थ को शरीर की रचना के वारे में जानकर ।लेकिन अभी सफर बाकी था अभी सफर में नई नई चीज सिद्धार्थ को देखने मिलने वाली थी।सिद्धार्थ और उनका सारथी मित्र चना अब आगे निकल पड़े ।थोड़े दूर जाने के बाद सिद्धार्थ की नजर दूर एक रोगी व्यक्ति पे पड़ी ,तब सिद्धार्थ अपने सारथी मित्र से पूछा ये कैसा व्यक्ति है,तब सारथी मित्र ने सिद्धार्थ को कहा कि ये रोगी व्यक्ति है जो अलग अलग बीमारी से ग्रस्त है,तब सिद्धार्थ बोला ये रोग, बीमारी क्या है?तब सारथी मित्र ने कहा कि रोग बीमारी वो चीज है जिससे व्यक्ति कमजोर हो जाता है,तब सिद्धार्थ बोला क्या में भी बीमार,कमजोर बनुगा,तब सारथी मित्र ने कहा सभी व्यक्ति बीमार कमजोर होते रहते है अपने जीवन मे।बीमार कमजोर शरीर के बारे में जानकार सिद्धार्थ को बड़ा विचित्र आश्चर्य हुवा ,क्योकि सिद्धार्थ ने ऐसी चीज कभी देखी नही थी।सिद्धार्थ और चना दोनों अब वहाँ से आगे निकल गये।थोडे दूर जाने के बाद सिद्धार्थ को एक मरा हुआ व्यक्ति दिखा, उस मरे हुई व्यक्ति को चार लोग एक अर्थी में कहि ले जा रहे थे,अर्थी के पीछे लोग रो रहे थे,बहोत से लोग कुछ ज्यादा ही विलाप कर रहे थे।सिद्धार्थ ये देखा तब उन्होंने सारथी से पूछा ये सब क्या है ?ये लोग विलाप,रो क्यू रहे है?तब सारथी मित्र ने सिद्धार्थ से कहा की अर्थी में सवार व्यक्ति मर गया है,इसलिए उनके संबंधी उस व्यक्ति के लिए विलाप ,रो रहे है,अर्थी में सवार व्यक्ति अब इस दुनिया मे नही रहा, अब वो व्यक्ति मर(मृत, मृत्यु)गया है,इसलिए ये लोग उस मृत व्यक्ति को अर्थी में सवार करके उसे श्मशान में ले जा रहे है,स्मशान में ले जाकर उस मृत व्यक्ति को चिता पर रखा जाएगा और उस मृत व्यक्ति को अग्नि के द्वारा जलाकर उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा।सारथी की बात सुनकर सिद्धार्थ बड़ा आश्चर्य हुवा, सिद्धार्थ ने सारथी से प्रश्न किया कि ये मृत्यु क्या है?तब सारथी ने सिद्धार्थ को जवाब दिया कि जो व्यक्ति जन्म लेता है उनकी मृत्यु निच्छित है।तब सिद्धार्थ को फिर प्रश्न हुवा की मेरी भी मृत्यु होंगी, तब सारथी ने कहा इसमें आश्चर्य वाली क्या बात है,जो जन्म लेता है उनकी मृत्यु जरूर होती है,में,तुम संसार के सारे प्राणी जो जन्म लेते है उनकी मृत्यु जरूर होती है और ये संसार की एकमात्र अटल सत्य बात है,जन्म जीवन मृत्यु। सिद्धार्थ को अपने सारथी मित्र चना की बात सुनकर बहोत ही आश्चर्य भी हुवा और साथ ही राजकुमार सिद्धार्थ को पहली बार दुःख का अनुभव हुवा या मिला। सिद्धार्थ और उनका मित्र दोनों सफर में बाते करते करते नगर राज्य में से पसार हो रहे थे।अब सिद्धार्थ और सारथी मित्र राज्य के बहार एक जंगल मे आ गए।दोनों जंगल मे अपने रथ में सवार होकर नदी,पहाड़,जंगली प्राणी,पंखी,पेड़ देख रहे थे।सारथी को आनंद आ रहा था... लेकिन सिद्धार्थ थोड़े आश्चर्यजनक अवस्था मे था ।जंगल मे थोड़े दूर जाने के बाद सिद्धार्थ को एक संन्यासी ध्यान अवस्था आसान में बैठे दिखा मिला।संन्यासी को देखकर सिद्धार्थ ने अपने मित्र सेे सवाल किया ये व्यक्ति कौन है?औऱ ये जंगल मे कर क्या रहा है?तब सारथी मित्र ने सिद्धार्थ को जवाब दिया कि,ये व्यक्ति एक संन्यासी है,उसने संसार का त्याग किया है,अव वो ध्यान,तप,योग करके भगवान को प्रगट करेगा औऱ ज्ञान,मुक्ति की प्राप्ति करेगा।सिद्धार्थ अपने सारथी मित्र की बात सुनते सुुनते संन्यासी को दूर से देखा।संन्यासी का चेहरा शांत और आंनद से भरपूर था।संन्यासी के पास कुछ भी नही था फिर भी संन्यासी के चहरे पे प्रसन्नता थी।सिद्धार्थ ने अपने मित्र से प्रश्न पूछा कि यही जीवन के दुखों से मुक्ति पाने का रास्ता है?तब सारथि मित्र ने सिद्धार्थ को कहा सायद ये रास्ता जीवन के दुखो से मुक्ति पानेका रास्ता हो सकता है...लेकिन मुझे अनुभव नही है।सिद्धार्थ और उनका सारथी मित्र चना सुबह से लेकर श्याम तक अपने राज्य का सफर किया।अंत मे दोनो ने राजमहल में वापस लौटने का फैसला किया।दोनों अब राजमहल की ओर जा रहे थे।सिद्धार्थ के लिए ये दिन एक नये अनुभव का दिन था,सफ़र उनके लिए काफी आश्चर्यजनक रहा,क्योकि सिद्धार्थ को इन सभी के बारे में पहले कोई पूर्वज्ञान नही था, ऐसी दुनिया का अनुभव नही हुवा था।सिद्धार्थ और उनका साथी महल मे पहोच गये। महल में पहोचकर सिद्धार्थ अपने कक्ष में आराम करने चले गये।रात को सिद्धार्थ अपनी पत्नी यशोधरा से दिनभर देखी सभी चीजों के बारे में बताया ।और कहाँ की संसार मे केवल दुःख ही दुःख है,जो जन्म लेता है उनकी मृत्यु जरूर होती है।साथ मे सिद्धार्थ ने यशोधरा को ये बात भी बतायी के आज मेने एक वृद्ध व्यक्ति ,रोगी व्यक्ति,मृत व्यक्ति को देखा। उन सभी व्यक्ति को देखकर दुःख का अनुभव हुवा।अंत मे मेने एक संन्यासी को देखा जो जीवन के दुःखो से मुक्त होने के लिये संन्यासी बना था और एकांत जंगल मे जाकर ध्यान,योग अवस्था मे बैठकर जीवन के दुःखो से मुक्त होने का प्रयास कर रहा था ।यशोधरा ने सिद्धार्थ की बात सुनी और कहा,ये सब जीवन का एक भाग है,औऱ उसमे हैरान होने की कोई बात नही है,औऱ हम दुःखी कहा है?हमारे आसपास तो खुशिया ही खुशिया है आनंद ही आनंद है।लेकिन सिद्धार्थ को ये तो पता चल गया था कि जिसे लोग सांसारिक सुख कहते है वो क्षणिक सुख है,ये संसार मे केवल दुःख ही दुःख है,उससे मुक्ति पाने का एक ही रास्ता है वो है संन्यास ।कुछ दिन बीत जानेके बाद सिद्धार्थ सत्य की खोज करनेका दृढ़ संकल्प किया अपने मन मे।और भीतर ही भीतर संन्यास लेने का विचार किया ताकि वो सत्य की खोज कर सके।एक रात जब सारे नगरवासी गहरी नींद में सो रहे थे,तब सिद्धार्थ अपने माता,पिता,पत्नी, पुत्र और अपना संपूर्ण राजपाठ छड़कर सत्य की खोज में निकल पड़े।सिद्धार्थ ने 29 वर्ष की आयु में गृह त्याग किया, जिसे बोद्ध धर्म मे महाभिनिष्क्रमण कहा गया।
संन्यासी के कपड़े पहनकर सिद्धार्थ संन्यासी बनकर जंगल की ओर सत्य की खोज में निकल पड़े।सिद्धार्थ बहूत से ऋषियों मुनियों से ज्ञान प्राप्त किया,और कठोर तपस्या भी की।सिद्धार्थ के सत्य की खोज के प्रथम गुरु आलार कलाम थे।सिद्धार्थ अपने पांच अनुयायियों के साथ कठोर तपस्या करने लगे।
बिना कुछ खाये,पिये वे बहुत कमजोर हो गई थे, वे जमीन पर गिर पड़े।जिसके बाद एक लड़की ने उन्हें पानी पिलाया और चावल खिलाया।उसके बाद उन्हें ये महसूस किया
किसी तरह भौतिक बाधा ओ में रहने से वह आध्यात्मिक लक्ष्यों को प्राप्त नही कर पायेंगे।उसके बाद सिद्धार्थ ने पीपल के पेड़ नीचे ध्यान करना शरू किया।49 दिनों के बाद आखिरकार उन्हें शुद्ध ज्ञान की प्राप्ति हुई,वो दिन था वैशाखी पूर्णिमा का दिन।
एक सुजाता नाम की स्त्री अपने पुत्र प्राप्ति की खुशी में सोने के थाल में खीर लेकर पीपल के वृक्ष नीचे बैठे सिद्धार्थ को ख़िर खिलायी और कहा-"कि जैसी मेरी मनोकामना पूर्ण हुई,उसी तरह आपकी मनोकामना पूर्ण हो।वर्षो की कठिन साधना के बाद बोधगया(बिहार)में बोधिवृक्ष के निचे ज्ञान हुवा।उसी रात सिद्धार्थ को बौधि ज्ञान हुवा।
ज्ञान प्राप्त करने के बाद सिद्धार्थ बुद्ध के नाम से जानने लगे।बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश सारनाथ में दीया, जिसे बौद्ध ग्रंथों में धर्मचक्र प्रवर्तन कहा गया।बुद्ध ने अपने उपदेश जनसाधारण की पाली भाषा मे दिया।बुद्ध ने अपने उपदेश कौशल, वैशाली, कौशाम्बी औऱ अन्य राज्य में दिये।बुद्ध के मुख्य शिष्य उपाली व आंनद थे।बुद्ध के प्रसिद्ध अनुयायी शासकों में बिम्बिसार, प्रसेनजित और उदयन थे।भगवान बुद्ध ने अपने संघो में सभी प्रकार के लोगों को स्थान दिया, बिना कोई भेदभाव सभी प्राणियों को अपने संघ में सामिल किया।गौतम बुद्ध की मृत्यु 483 ईशा पूर्व में कुशीनारा में हुई,उस समय उनकी आयु 80 वर्ष की थी।बौद्ध धर्म मे इसे महापरिनिर्वाण कहते है।
नमस्कार।
बुद्ध के जन्म के सात दिन बाद बुद्ध की माता महामाया का निधन हो गया,महामाया के निधन के बाद बुद्ध का लालन पालन शुद्धोधन की दूसरी पत्नी गौतमी(महाप्रजापति गौतमी) ने किया।बुद्ध का जन्म हुवा तब उनके नामकरण के समय महाराज शुद्धोधन एक बड़ा नामकरण समारोह रखा,उसमे बड़े बड़े ऋषि-मुनि गुरु,ज्योतिष विद्या के जानकार आये।उनके नामकरण समारोह के दौरान ऋषि आशित मुनि ने भविष्यवाणी की -"के ये बालक या तो एक बड़ा सम्राट राजा बनेगा या एक महान पवित्र ऋषि जो मानवता का कल्याण करेगा।बुद्ध के बारे में सभा मे आये ऋषि मुनियों की भविष्यवाणी के अनुसार,"ये बालक एक महान इंसान बनेगा,सिद्धार्थ को जीवन के कड़वे अनुभव होंगे तब सिद्धार्थ राजपाट का त्याग करके संन्यास धारण करके सिद्धि प्राप्त करने जंगल(अरण्य) चला जायेगा और महान धर्म की स्थापना करेगा । ऐसी भविष्यवाणी सुनकर पिता शुद्धोधन को अपने पुत्र सिद्धार्थ की बहोत चिंता हुई,क्योकि शुद्धोधन अपने पुत्र को एक सम्राट बनाना चाहते थे।शुद्धोधन को दिनरात चिंता सताती थी के गौतम बड़ा होकर संन्यासी न बन जाये।भविष्यवाणी के अनुसार यदि गौतम राजमहल में टीका रहा तो वो महान सम्राट राजा जरूर बनेगा।राजा शुद्धोधन सिद्धार्थ के लिए भोग विलास के भरपूर प्रबंध किए,तीन ऋतु के तीन सुंदर महल ,महलो में मनोरंजन की सारी सामग्री के साथ दासदासी गौतम की सेवा में रखी।सिद्धार्थ के गुरू विश्वामित्र थे,विश्वामित्र ने सिद्धार्थ को वेद,पुराण,उपनिषद के साथ अस्त्र शस्त्र, युद्ध कौशल विद्या शिक्षा दी।राजा शुद्धोधन ने सिद्धार्थ को संन्यासी बनने से रोकने लिए,सांसारिक मोहमाया में बाधे रखने के लिए कई प्रयत्न किए।सिद्धार्थ के पिता ने सिद्धार्थ को सभी दुखो ,पीड़ाओं से दूर रखा,लेकिन सिद्धार्थ बचपन से ही संवेदनशील और करुणामय व्यक्ति था,वे कभी किसी दुसरो का दुःख नही देख सकते थे,जिसके कारण सभी लोग उनसे बहुत प्रेम करते थे।शांकय वंश में जन्मे सिद्धार्थ का 16 वर्ष की आयु में राजा दंडपाणि की कन्या यशोधरा के साथ विवाह हुवा।सिद्धार्थ अब युवा हो गई थे, वे अब हर चीज को जानने को बड़े ही उत्सुक रहते थे।समय के साथ सिद्धार्थ की पत्नी यशोधरा को एक पुत्र हुवा,उनका नाम राहुल रखा।एक बार पहली बार सिद्धार्थ को अपने नगर राज्य के बाहर भ्रमण करने का विचार आया,उन्होंने राजा शुद्धोधन से पहली बार महल से बाहर भ्रमण करने के लिए अनुमति मांगी।जिसके बाद सिद्धार्थ अपने बचपन के मित्र सारथी चना के साथ भ्रमण पर निकल पड़े।सिद्धार्थ के लिए एक नया अनुभव होने जा रहा था।सिद्धार्थ के जीवन के रास्ते मे अब विविधता आने वाली थी ।सिद्धार्थ के पिता शुद्धोधन भी अपने पुत्र को रोक नही सकते थे,क्योकि सिद्धार्थ अब समझदार हो गया था।लेकिन सिद्धार्थ के पिता शुद्धोधन को ऋषि मुनियों की भविष्यवाणी हर वक्त याद रहती थी।लेकिन होनी को कौन टाल सकता है,गौतम सिद्धार्थ या तो सम्राट या तो महान ऋषि बनेगा।सिद्धार्थ जो पहली बार राजमहल से बाहर अपनी मर्जी से पिता की अनुमति से निकला है।सिद्धार्थ एक सुंदर रथ में सवार होकर अपने मित्र सारथी चना के साथ नगर यात्रा करने चल पड़ा।रास्ते मे सिद्धार्थ को नयी नयी चीज देखने मिली जो पहले सिद्धार्थ कभी देखी नही थी।सिद्धार्थ के लिए ये एक नया अनुभव था। रास्ते मे सिद्धार्थ को बडी उम्र का एक वृद्ध बुढा व्यक्ति मिला,सिद्धार्थ पहली बार वृद्ध व्यक्ति को देखा, सिद्धार्थ ने अपने सारथी मित्र को पूछा ये केैसा व्यक्ति है? तब सारथी मित्र ने कहा की ये एक वृद्ध व्यक्ति है,तब सिद्धार्थ ने कहा ये वृद्ध क्या होता है?तब सारथी मित्र ने कहा की हर व्यक्ति अपनी उम्र समय के अनुसार वृद्ध होता है,तब सिद्धार्थ ने सारथी मित्र से कहा क्या में भी वृद्ध बनुगा,तब सारथी मित्र ने कहा सभी व्यक्ति वृद्ध बनते है-जो जन्म लेता है वो जवान होता है और जो जवान होता है वो वृद्ध अवश्य होता है,ये एक कुदरत का नियम है,सिद्धार्थ अपने सारथी मित्र की बाते ध्यान से सुना और साथ मे आश्चर्य भी हुवा सिद्धार्थ को शरीर की रचना के वारे में जानकर ।लेकिन अभी सफर बाकी था अभी सफर में नई नई चीज सिद्धार्थ को देखने मिलने वाली थी।सिद्धार्थ और उनका सारथी मित्र चना अब आगे निकल पड़े ।थोड़े दूर जाने के बाद सिद्धार्थ की नजर दूर एक रोगी व्यक्ति पे पड़ी ,तब सिद्धार्थ अपने सारथी मित्र से पूछा ये कैसा व्यक्ति है,तब सारथी मित्र ने सिद्धार्थ को कहा कि ये रोगी व्यक्ति है जो अलग अलग बीमारी से ग्रस्त है,तब सिद्धार्थ बोला ये रोग, बीमारी क्या है?तब सारथी मित्र ने कहा कि रोग बीमारी वो चीज है जिससे व्यक्ति कमजोर हो जाता है,तब सिद्धार्थ बोला क्या में भी बीमार,कमजोर बनुगा,तब सारथी मित्र ने कहा सभी व्यक्ति बीमार कमजोर होते रहते है अपने जीवन मे।बीमार कमजोर शरीर के बारे में जानकार सिद्धार्थ को बड़ा विचित्र आश्चर्य हुवा ,क्योकि सिद्धार्थ ने ऐसी चीज कभी देखी नही थी।सिद्धार्थ और चना दोनों अब वहाँ से आगे निकल गये।थोडे दूर जाने के बाद सिद्धार्थ को एक मरा हुआ व्यक्ति दिखा, उस मरे हुई व्यक्ति को चार लोग एक अर्थी में कहि ले जा रहे थे,अर्थी के पीछे लोग रो रहे थे,बहोत से लोग कुछ ज्यादा ही विलाप कर रहे थे।सिद्धार्थ ये देखा तब उन्होंने सारथी से पूछा ये सब क्या है ?ये लोग विलाप,रो क्यू रहे है?तब सारथी मित्र ने सिद्धार्थ से कहा की अर्थी में सवार व्यक्ति मर गया है,इसलिए उनके संबंधी उस व्यक्ति के लिए विलाप ,रो रहे है,अर्थी में सवार व्यक्ति अब इस दुनिया मे नही रहा, अब वो व्यक्ति मर(मृत, मृत्यु)गया है,इसलिए ये लोग उस मृत व्यक्ति को अर्थी में सवार करके उसे श्मशान में ले जा रहे है,स्मशान में ले जाकर उस मृत व्यक्ति को चिता पर रखा जाएगा और उस मृत व्यक्ति को अग्नि के द्वारा जलाकर उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा।सारथी की बात सुनकर सिद्धार्थ बड़ा आश्चर्य हुवा, सिद्धार्थ ने सारथी से प्रश्न किया कि ये मृत्यु क्या है?तब सारथी ने सिद्धार्थ को जवाब दिया कि जो व्यक्ति जन्म लेता है उनकी मृत्यु निच्छित है।तब सिद्धार्थ को फिर प्रश्न हुवा की मेरी भी मृत्यु होंगी, तब सारथी ने कहा इसमें आश्चर्य वाली क्या बात है,जो जन्म लेता है उनकी मृत्यु जरूर होती है,में,तुम संसार के सारे प्राणी जो जन्म लेते है उनकी मृत्यु जरूर होती है और ये संसार की एकमात्र अटल सत्य बात है,जन्म जीवन मृत्यु। सिद्धार्थ को अपने सारथी मित्र चना की बात सुनकर बहोत ही आश्चर्य भी हुवा और साथ ही राजकुमार सिद्धार्थ को पहली बार दुःख का अनुभव हुवा या मिला। सिद्धार्थ और उनका मित्र दोनों सफर में बाते करते करते नगर राज्य में से पसार हो रहे थे।अब सिद्धार्थ और सारथी मित्र राज्य के बहार एक जंगल मे आ गए।दोनों जंगल मे अपने रथ में सवार होकर नदी,पहाड़,जंगली प्राणी,पंखी,पेड़ देख रहे थे।सारथी को आनंद आ रहा था... लेकिन सिद्धार्थ थोड़े आश्चर्यजनक अवस्था मे था ।जंगल मे थोड़े दूर जाने के बाद सिद्धार्थ को एक संन्यासी ध्यान अवस्था आसान में बैठे दिखा मिला।संन्यासी को देखकर सिद्धार्थ ने अपने मित्र सेे सवाल किया ये व्यक्ति कौन है?औऱ ये जंगल मे कर क्या रहा है?तब सारथी मित्र ने सिद्धार्थ को जवाब दिया कि,ये व्यक्ति एक संन्यासी है,उसने संसार का त्याग किया है,अव वो ध्यान,तप,योग करके भगवान को प्रगट करेगा औऱ ज्ञान,मुक्ति की प्राप्ति करेगा।सिद्धार्थ अपने सारथी मित्र की बात सुनते सुुनते संन्यासी को दूर से देखा।संन्यासी का चेहरा शांत और आंनद से भरपूर था।संन्यासी के पास कुछ भी नही था फिर भी संन्यासी के चहरे पे प्रसन्नता थी।सिद्धार्थ ने अपने मित्र से प्रश्न पूछा कि यही जीवन के दुखों से मुक्ति पाने का रास्ता है?तब सारथि मित्र ने सिद्धार्थ को कहा सायद ये रास्ता जीवन के दुखो से मुक्ति पानेका रास्ता हो सकता है...लेकिन मुझे अनुभव नही है।सिद्धार्थ और उनका सारथी मित्र चना सुबह से लेकर श्याम तक अपने राज्य का सफर किया।अंत मे दोनो ने राजमहल में वापस लौटने का फैसला किया।दोनों अब राजमहल की ओर जा रहे थे।सिद्धार्थ के लिए ये दिन एक नये अनुभव का दिन था,सफ़र उनके लिए काफी आश्चर्यजनक रहा,क्योकि सिद्धार्थ को इन सभी के बारे में पहले कोई पूर्वज्ञान नही था, ऐसी दुनिया का अनुभव नही हुवा था।सिद्धार्थ और उनका साथी महल मे पहोच गये। महल में पहोचकर सिद्धार्थ अपने कक्ष में आराम करने चले गये।रात को सिद्धार्थ अपनी पत्नी यशोधरा से दिनभर देखी सभी चीजों के बारे में बताया ।और कहाँ की संसार मे केवल दुःख ही दुःख है,जो जन्म लेता है उनकी मृत्यु जरूर होती है।साथ मे सिद्धार्थ ने यशोधरा को ये बात भी बतायी के आज मेने एक वृद्ध व्यक्ति ,रोगी व्यक्ति,मृत व्यक्ति को देखा। उन सभी व्यक्ति को देखकर दुःख का अनुभव हुवा।अंत मे मेने एक संन्यासी को देखा जो जीवन के दुःखो से मुक्त होने के लिये संन्यासी बना था और एकांत जंगल मे जाकर ध्यान,योग अवस्था मे बैठकर जीवन के दुःखो से मुक्त होने का प्रयास कर रहा था ।यशोधरा ने सिद्धार्थ की बात सुनी और कहा,ये सब जीवन का एक भाग है,औऱ उसमे हैरान होने की कोई बात नही है,औऱ हम दुःखी कहा है?हमारे आसपास तो खुशिया ही खुशिया है आनंद ही आनंद है।लेकिन सिद्धार्थ को ये तो पता चल गया था कि जिसे लोग सांसारिक सुख कहते है वो क्षणिक सुख है,ये संसार मे केवल दुःख ही दुःख है,उससे मुक्ति पाने का एक ही रास्ता है वो है संन्यास ।कुछ दिन बीत जानेके बाद सिद्धार्थ सत्य की खोज करनेका दृढ़ संकल्प किया अपने मन मे।और भीतर ही भीतर संन्यास लेने का विचार किया ताकि वो सत्य की खोज कर सके।एक रात जब सारे नगरवासी गहरी नींद में सो रहे थे,तब सिद्धार्थ अपने माता,पिता,पत्नी, पुत्र और अपना संपूर्ण राजपाठ छड़कर सत्य की खोज में निकल पड़े।सिद्धार्थ ने 29 वर्ष की आयु में गृह त्याग किया, जिसे बोद्ध धर्म मे महाभिनिष्क्रमण कहा गया।
संन्यासी के कपड़े पहनकर सिद्धार्थ संन्यासी बनकर जंगल की ओर सत्य की खोज में निकल पड़े।सिद्धार्थ बहूत से ऋषियों मुनियों से ज्ञान प्राप्त किया,और कठोर तपस्या भी की।सिद्धार्थ के सत्य की खोज के प्रथम गुरु आलार कलाम थे।सिद्धार्थ अपने पांच अनुयायियों के साथ कठोर तपस्या करने लगे।
बिना कुछ खाये,पिये वे बहुत कमजोर हो गई थे, वे जमीन पर गिर पड़े।जिसके बाद एक लड़की ने उन्हें पानी पिलाया और चावल खिलाया।उसके बाद उन्हें ये महसूस किया
किसी तरह भौतिक बाधा ओ में रहने से वह आध्यात्मिक लक्ष्यों को प्राप्त नही कर पायेंगे।उसके बाद सिद्धार्थ ने पीपल के पेड़ नीचे ध्यान करना शरू किया।49 दिनों के बाद आखिरकार उन्हें शुद्ध ज्ञान की प्राप्ति हुई,वो दिन था वैशाखी पूर्णिमा का दिन।
एक सुजाता नाम की स्त्री अपने पुत्र प्राप्ति की खुशी में सोने के थाल में खीर लेकर पीपल के वृक्ष नीचे बैठे सिद्धार्थ को ख़िर खिलायी और कहा-"कि जैसी मेरी मनोकामना पूर्ण हुई,उसी तरह आपकी मनोकामना पूर्ण हो।वर्षो की कठिन साधना के बाद बोधगया(बिहार)में बोधिवृक्ष के निचे ज्ञान हुवा।उसी रात सिद्धार्थ को बौधि ज्ञान हुवा।
ज्ञान प्राप्त करने के बाद सिद्धार्थ बुद्ध के नाम से जानने लगे।बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश सारनाथ में दीया, जिसे बौद्ध ग्रंथों में धर्मचक्र प्रवर्तन कहा गया।बुद्ध ने अपने उपदेश जनसाधारण की पाली भाषा मे दिया।बुद्ध ने अपने उपदेश कौशल, वैशाली, कौशाम्बी औऱ अन्य राज्य में दिये।बुद्ध के मुख्य शिष्य उपाली व आंनद थे।बुद्ध के प्रसिद्ध अनुयायी शासकों में बिम्बिसार, प्रसेनजित और उदयन थे।भगवान बुद्ध ने अपने संघो में सभी प्रकार के लोगों को स्थान दिया, बिना कोई भेदभाव सभी प्राणियों को अपने संघ में सामिल किया।गौतम बुद्ध की मृत्यु 483 ईशा पूर्व में कुशीनारा में हुई,उस समय उनकी आयु 80 वर्ष की थी।बौद्ध धर्म मे इसे महापरिनिर्वाण कहते है।
नमस्कार।






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