Friday, 4 October 2019

अध्ययन अध्यापक

देश के विकास के लिए छात्र,किसान,शिक्षक ,सिपाही,व्यापारी और मजदूर का महत्वपूर्ण स्थान हे।देश में किसान फसल पैदा करके देश के विकास में अपना उत्तम योगदान देता हे।देश में सिपाही सैनिक  राष्ट्र की सुरक्षा करके देश के विकास में अहम योगदान देता हे।उस प्रकार व्यापारी और मजदूर भी अपनी कड़ी मेहनत से देश के विकास के लिए कार्य करते हे ,वो बात बहोत महत्वपूर्ण बात हे।                                                                                                                                                                       
                                                                      देश के सभी क्षेत्र में देश के विकास में अध्यापक या शिक्षक का कार्य महत्वपूर्ण हे। देश के विकास के लिए देश के लोगों का कार्य सब से महत्वपूर्ण हे। जिस देश के लोगो में देशप्रेम होता हे उस देश का विकास देश के सभी क्षेत्र में बेहतर होता हे। बहोत ऐसे देश हे जो बहोत छोटे देश होते हे लेकिन उस छोटे देशो के लोगो ने देश के विकास में अपना उत्तम योगदान दिया हे। अध्ययन अध्यापन की बात करे तो देश के सभी छात्रों  को बेहतर बनाने की जवाबदारी देश के अध्यापको के शिर हे।मतलब के देश के सभी बच्चो की जवाबदारी माता पिता के साथ अध्यापको के शिर पर भी हे। एक अध्यापक ही एक छात्र को अपने पैरो पे खड़ा होना शिखा सकता हे। देश के विकास में  अध्यापक का कार्य महत्वपूर्ण हे। देश में से होनहार छात्र देश के विकास के लिए कार्य करे ,इस बात पर बात करे तो इस बात की जबाबदारी देश के सभी अध्यापक की हे। एक अच्छा अध्यापक ही एक होनहार छात्र को जन्म देता हे। देश के ज्यादा से ज्यादा बच्चे अच्छी शिक्षा लेंगे तब देश का विकास होना निश्चित हे।                                                                                                                                                                                               
                                                                       देश के सभी अध्यापक पाठशाला से लेकर कॉलेज तक बच्चो को अच्छी शिक्षा देते हे ये बहोत अच्छी बात हे ,पर जब छात्र अपनी शिक्षा के अनुरूप ज्ञान से देश के विकास में अपना योगदान दे ये बात  बहोत अच्छी हे साथ साथ माता,पिता और अध्यापक के लिए  गर्व करने वाली बात  हे। देश के अध्यापको को बच्चो को पढाई के साथ देश की सेवा करे ऐसी शिक्षा देनी चाहिए ,जरूर पड़े तो देश के विकास के लिए त्याग और बलिदान देने को तैयार रहे।छात्रों में देशप्रेम,देशभक्त,देशभक्ति के साथ दया प्रेम ,करुणा ,करुणा ,सत्य और अहिंसा के मूल्यों का सिंचन करना चाहिए।जिस छात्र में देशभक्ति और देशप्रेम का गुण कम उम्र में आ जाते हे वो बड़ा होकर देश के विकास में अपना उत्तम योगदान देता हे। देश में देशप्रेमी लोग ही देश के विकास में अपना उत्तम योगदान देते हे हमेशा  से ,और इसी योगदान से  देश सभी क्षेत्र में आगे बढ़ता हे।                                                                                                                                                                                                                                                                                                      
                                                                       देश में जितने भी महान लोग हो गए हे वो बचपन में कभी छात्र रहे होंगे। उन सभी महान  लोगो को अध्यापन कराने की जवाबदारी उस समय के अध्यापको को मिली होंगी ,इस बात से लगता हे पुरातन समय के अध्यापक और छात्र आधुनिक छात्र और अध्यापक से बेहतर होंगे। देश के सभी क्षेत्र के विकास की जबाबदारी आज के छात्रों और अध्यापकों की ही हे। अध्यापक देश के विकास की नीव हे ,जो बेहतर विधार्थी का आधारस्तंभ  तैयार करता हे।                                                                                       
                                                                                                                                                              अंत में ,भारत देश के महान ज्ञानी महापुरुष की बात याद  आ जाती हे की शिक्षक कभी साधारण नहीं होता ,प्रलय और निर्माण उनकी गोद में होता हे -चाणक्य। इस बात से पता चलता हे की देश के विकास में अध्ययन,अध्यापन और अध्यापक का कार्य महत्वपूर्ण हे। हर देश की  तरक्की देश के अध्यापको के बदौलत हे , देश का निर्माण अध्यापको से  होता हे। देश के सभी लोग अध्यापको को गुरु मानकर सम्मान करना चाहिए।देश  के सभी सभी सामाजिक प्राणीयो को अध्यापको का आदर करना चाहिए। देश के विकास की जवाबदारी माता-पिता ,अध्यापको के साथ देश के सभी समाजिक प्राणियों की भी हे। ...... नमस्कार भारत जय हिन्द                                                                                                         

Thursday, 29 August 2019

Element contemplation333: सिद्धार्थ से बुद्ध

Element contemplation333: बुद्ध: गौतम बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व  लुंबिनी(नेपाल) स्थित जगह कपिलवस्तु नाम के राज्य में हुवा था।......गौतम बुद्ध के बचपन का नाम सिद्धार्थ था,...

सिद्धार्थ से बुद्ध

गौतम बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व  लुंबिनी(नेपाल) स्थित जगह कपिलवस्तु नाम के राज्य में हुवा था।गौतम बुद्ध के बचपन का नाम सिद्धार्थ था,सिद्धार्थ का अर्थ है-"वह जो सिद्धि प्राप्ति के लिये जन्म लिया हो"। बुद्ध के पिता का नाम शुद्धोधन था, जो शाक्य गण के मुखिया थे और शाक्य गण राज्यों के महाराजा थे।बुद्ध की माता का नाम महामाया (मायादेवी) था।
बुद्ध के जन्म के सात दिन बाद बुद्ध की माता महामाया का निधन हो गया,महामाया के निधन के बाद बुद्ध का लालन पालन शुद्धोधन की दूसरी पत्नी गौतमी(महाप्रजापति गौतमी) ने किया।बुद्ध का जन्म हुवा तब उनके नामकरण के समय महाराज शुद्धोधन एक बड़ा नामकरण समारोह रखा,उसमे बड़े बड़े ऋषि-मुनि गुरु,ज्योतिष विद्या के जानकार आये।उनके नामकरण समारोह के दौरान ऋषि आशित मुनि ने भविष्यवाणी की -"के ये बालक या तो एक बड़ा सम्राट राजा बनेगा या एक महान पवित्र ऋषि जो मानवता का कल्याण करेगा।बुद्ध के बारे में सभा मे आये ऋषि मुनियों  की भविष्यवाणी के अनुसार,"ये बालक एक महान इंसान बनेगा,सिद्धार्थ को जीवन के कड़वे अनुभव होंगे तब सिद्धार्थ राजपाट का त्याग करके संन्यास धारण करके सिद्धि प्राप्त करने जंगल(अरण्य) चला जायेगा और महान धर्म की स्थापना करेगा । ऐसी भविष्यवाणी सुनकर पिता शुद्धोधन को अपने पुत्र सिद्धार्थ की बहोत चिंता हुई,क्योकि शुद्धोधन अपने पुत्र को एक सम्राट बनाना चाहते थे।शुद्धोधन को दिनरात चिंता सताती थी के गौतम बड़ा होकर संन्यासी न बन जाये।भविष्यवाणी के अनुसार यदि गौतम राजमहल में टीका रहा तो वो महान सम्राट राजा जरूर बनेगा।राजा शुद्धोधन सिद्धार्थ के लिए भोग विलास के भरपूर प्रबंध किए,तीन ऋतु के  तीन सुंदर महल ,महलो में मनोरंजन की सारी सामग्री के साथ दासदासी गौतम की सेवा में रखी।सिद्धार्थ के गुरू विश्वामित्र थे,विश्वामित्र ने सिद्धार्थ को वेद,पुराण,उपनिषद के साथ अस्त्र शस्त्र, युद्ध कौशल विद्या शिक्षा दी।राजा शुद्धोधन ने सिद्धार्थ को संन्यासी बनने से रोकने लिए,सांसारिक मोहमाया में बाधे रखने के लिए कई प्रयत्न किए।सिद्धार्थ के पिता ने सिद्धार्थ को सभी दुखो ,पीड़ाओं से दूर रखा,लेकिन सिद्धार्थ बचपन से ही संवेदनशील और करुणामय व्यक्ति था,वे कभी किसी दुसरो का दुःख नही देख सकते थे,जिसके कारण सभी लोग उनसे बहुत प्रेम करते थे।शांकय वंश में जन्मे सिद्धार्थ का 16 वर्ष की आयु में राजा दंडपाणि की कन्या यशोधरा के साथ विवाह हुवा।सिद्धार्थ अब युवा हो गई थे, वे अब हर चीज को जानने को बड़े ही उत्सुक रहते थे।समय के साथ सिद्धार्थ की पत्नी यशोधरा को एक पुत्र हुवा,उनका नाम राहुल रखा।एक बार पहली बार सिद्धार्थ को अपने नगर राज्य के  बाहर भ्रमण करने का विचार आया,उन्होंने राजा शुद्धोधन से पहली बार महल से बाहर भ्रमण करने के लिए अनुमति मांगी।जिसके बाद सिद्धार्थ अपने बचपन के मित्र सारथी चना के साथ भ्रमण पर निकल पड़े।सिद्धार्थ के लिए एक नया अनुभव होने जा रहा था।सिद्धार्थ के जीवन के रास्ते मे अब विविधता आने वाली थी ।सिद्धार्थ के पिता शुद्धोधन भी अपने पुत्र को रोक नही सकते थे,क्योकि सिद्धार्थ अब समझदार हो गया था।लेकिन सिद्धार्थ के पिता शुद्धोधन को ऋषि मुनियों की भविष्यवाणी  हर वक्त याद रहती थी।लेकिन होनी को कौन टाल सकता है,गौतम सिद्धार्थ या तो सम्राट या तो महान ऋषि बनेगा।सिद्धार्थ जो पहली बार राजमहल से बाहर अपनी मर्जी से पिता की अनुमति से निकला है।सिद्धार्थ एक सुंदर रथ में सवार होकर अपने मित्र सारथी चना के साथ नगर यात्रा करने चल पड़ा।रास्ते मे सिद्धार्थ को नयी नयी चीज देखने  मिली जो पहले सिद्धार्थ कभी देखी नही थी।सिद्धार्थ के लिए ये एक नया अनुभव था। रास्ते मे सिद्धार्थ को बडी उम्र का एक वृद्ध बुढा व्यक्ति मिला,सिद्धार्थ पहली बार वृद्ध व्यक्ति को देखा, सिद्धार्थ ने अपने सारथी मित्र को पूछा ये केैसा व्यक्ति है? तब सारथी मित्र ने कहा की ये एक वृद्ध व्यक्ति है,तब सिद्धार्थ ने कहा ये वृद्ध क्या होता है?तब सारथी मित्र ने कहा की हर व्यक्ति अपनी उम्र समय के अनुसार वृद्ध होता है,तब सिद्धार्थ ने सारथी मित्र से कहा क्या में भी वृद्ध बनुगा,तब सारथी मित्र ने कहा सभी व्यक्ति वृद्ध बनते है-जो जन्म लेता है वो जवान होता है और जो जवान होता है वो वृद्ध अवश्य होता है,ये एक कुदरत का नियम है,सिद्धार्थ अपने सारथी मित्र की बाते ध्यान से सुना और साथ मे आश्चर्य भी हुवा सिद्धार्थ को शरीर की रचना के वारे में जानकर ।लेकिन अभी सफर बाकी था अभी सफर में नई नई चीज सिद्धार्थ को देखने मिलने वाली थी।सिद्धार्थ और उनका सारथी मित्र चना अब आगे निकल पड़े ।थोड़े दूर जाने के बाद सिद्धार्थ की नजर दूर एक रोगी व्यक्ति पे पड़ी ,तब सिद्धार्थ अपने सारथी मित्र से पूछा ये कैसा व्यक्ति है,तब सारथी मित्र ने सिद्धार्थ को कहा कि ये रोगी व्यक्ति है जो अलग अलग बीमारी से ग्रस्त है,तब सिद्धार्थ बोला ये रोग, बीमारी क्या है?तब सारथी मित्र ने कहा कि रोग बीमारी वो चीज है जिससे व्यक्ति कमजोर हो जाता है,तब सिद्धार्थ बोला क्या में भी बीमार,कमजोर बनुगा,तब सारथी मित्र ने कहा सभी व्यक्ति बीमार कमजोर होते रहते है अपने जीवन मे।बीमार कमजोर शरीर के बारे में जानकार सिद्धार्थ को बड़ा विचित्र आश्चर्य हुवा ,क्योकि सिद्धार्थ ने ऐसी चीज कभी देखी नही थी।सिद्धार्थ और चना दोनों अब वहाँ से आगे निकल गये।थोडे दूर जाने के बाद सिद्धार्थ को एक मरा हुआ व्यक्ति दिखा, उस मरे हुई व्यक्ति को चार लोग एक अर्थी में कहि ले जा रहे थे,अर्थी के पीछे लोग रो रहे थे,बहोत से लोग कुछ ज्यादा ही विलाप कर रहे थे।सिद्धार्थ ये देखा तब उन्होंने सारथी से पूछा ये सब क्या है ?ये लोग विलाप,रो क्यू रहे है?तब सारथी मित्र ने सिद्धार्थ से कहा की अर्थी में सवार व्यक्ति मर गया है,इसलिए उनके संबंधी उस व्यक्ति के लिए विलाप ,रो रहे है,अर्थी में सवार व्यक्ति अब इस दुनिया मे नही रहा, अब वो व्यक्ति मर(मृत, मृत्यु)गया है,इसलिए ये लोग उस मृत व्यक्ति को अर्थी में सवार करके उसे श्मशान में ले जा रहे है,स्मशान में ले जाकर उस मृत व्यक्ति को चिता पर रखा जाएगा और उस मृत व्यक्ति को अग्नि के द्वारा जलाकर उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा।सारथी की बात सुनकर सिद्धार्थ बड़ा आश्चर्य हुवा, सिद्धार्थ ने सारथी से प्रश्न किया कि ये मृत्यु क्या है?तब सारथी ने सिद्धार्थ को जवाब दिया कि जो व्यक्ति जन्म लेता है उनकी मृत्यु निच्छित है।तब सिद्धार्थ को फिर प्रश्न हुवा की मेरी भी मृत्यु होंगी, तब सारथी ने कहा इसमें आश्चर्य वाली क्या बात है,जो जन्म लेता है उनकी मृत्यु जरूर होती है,में,तुम संसार के सारे प्राणी जो जन्म लेते है उनकी मृत्यु जरूर होती है और ये संसार की एकमात्र अटल सत्य बात है,जन्म जीवन मृत्यु। सिद्धार्थ को अपने सारथी मित्र चना की बात सुनकर बहोत ही आश्चर्य भी हुवा और साथ ही राजकुमार सिद्धार्थ को पहली बार दुःख का अनुभव हुवा या मिला। सिद्धार्थ और उनका मित्र दोनों सफर में बाते करते करते नगर राज्य में से पसार हो रहे थे।अब सिद्धार्थ और सारथी मित्र राज्य के बहार एक जंगल मे आ गए।दोनों जंगल मे अपने रथ में सवार होकर नदी,पहाड़,जंगली प्राणी,पंखी,पेड़ देख रहे थे।सारथी को आनंद आ रहा था... लेकिन सिद्धार्थ थोड़े आश्चर्यजनक अवस्था मे था ।जंगल मे थोड़े दूर जाने के बाद सिद्धार्थ को एक संन्यासी ध्यान अवस्था आसान में बैठे दिखा मिला।संन्यासी को देखकर सिद्धार्थ ने अपने मित्र सेे सवाल किया ये व्यक्ति कौन है?औऱ ये जंगल मे कर क्या रहा है?तब सारथी मित्र ने सिद्धार्थ को जवाब दिया कि,ये व्यक्ति एक संन्यासी है,उसने संसार का त्याग किया है,अव वो ध्यान,तप,योग करके भगवान को प्रगट करेगा औऱ ज्ञान,मुक्ति की प्राप्ति करेगा।सिद्धार्थ अपने सारथी मित्र की बात सुनते सुुनते संन्यासी को दूर से देखा।संन्यासी का चेहरा शांत और आंनद से भरपूर था।संन्यासी के पास कुछ भी नही था फिर भी संन्यासी के चहरे पे प्रसन्नता थी।सिद्धार्थ ने अपने मित्र से प्रश्न पूछा कि यही जीवन के दुखों से मुक्ति पाने का रास्ता है?तब सारथि मित्र ने सिद्धार्थ को कहा सायद ये रास्ता जीवन के दुखो से मुक्ति पानेका रास्ता हो सकता है...लेकिन मुझे अनुभव नही है।सिद्धार्थ और उनका सारथी मित्र चना सुबह से लेकर श्याम तक अपने राज्य का सफर किया।अंत मे दोनो ने राजमहल में वापस लौटने का फैसला किया।दोनों अब राजमहल की ओर जा रहे थे।सिद्धार्थ के लिए ये दिन एक नये अनुभव का दिन था,सफ़र उनके लिए काफी आश्चर्यजनक रहा,क्योकि सिद्धार्थ को इन सभी के बारे में पहले कोई पूर्वज्ञान नही था, ऐसी दुनिया का अनुभव नही हुवा था।सिद्धार्थ और उनका साथी महल मे पहोच गये। महल में पहोचकर सिद्धार्थ अपने कक्ष में आराम करने चले गये।रात को सिद्धार्थ अपनी पत्नी यशोधरा से दिनभर देखी सभी चीजों के बारे में बताया ।और कहाँ की संसार मे केवल दुःख ही दुःख है,जो जन्म लेता है उनकी मृत्यु जरूर होती है।साथ मे सिद्धार्थ ने यशोधरा को ये बात भी बतायी के आज मेने एक वृद्ध व्यक्ति ,रोगी व्यक्ति,मृत व्यक्ति को देखा। उन सभी व्यक्ति को देखकर दुःख का अनुभव हुवा।अंत मे मेने एक संन्यासी को देखा जो जीवन के दुःखो से मुक्त होने के लिये संन्यासी बना था और एकांत जंगल मे जाकर ध्यान,योग अवस्था मे बैठकर जीवन के दुःखो से मुक्त होने का प्रयास कर रहा था ।यशोधरा ने सिद्धार्थ की बात सुनी और कहा,ये सब जीवन का एक भाग है,औऱ उसमे हैरान होने की कोई बात नही है,औऱ हम दुःखी कहा है?हमारे आसपास तो खुशिया ही खुशिया है आनंद ही आनंद है।लेकिन सिद्धार्थ को ये तो पता चल गया था कि जिसे लोग सांसारिक सुख कहते है वो क्षणिक सुख है,ये संसार मे केवल दुःख ही दुःख है,उससे मुक्ति पाने का एक ही रास्ता है वो है संन्यास ।कुछ दिन बीत जानेके बाद सिद्धार्थ सत्य की खोज करनेका दृढ़ संकल्प किया अपने मन मे।और भीतर ही भीतर संन्यास लेने का विचार किया ताकि वो सत्य की खोज कर सके।एक रात जब सारे नगरवासी गहरी नींद में सो रहे थे,तब सिद्धार्थ अपने माता,पिता,पत्नी, पुत्र और अपना संपूर्ण राजपाठ छड़कर सत्य की खोज में निकल पड़े।सिद्धार्थ ने 29 वर्ष की आयु में गृह त्याग किया, जिसे बोद्ध धर्म मे महाभिनिष्क्रमण कहा गया।
संन्यासी के कपड़े पहनकर सिद्धार्थ संन्यासी बनकर जंगल की ओर सत्य की खोज में निकल पड़े।सिद्धार्थ बहूत से ऋषियों मुनियों से ज्ञान प्राप्त किया,और कठोर तपस्या भी की।सिद्धार्थ के सत्य की खोज के प्रथम गुरु आलार कलाम थे।सिद्धार्थ अपने पांच अनुयायियों के साथ कठोर तपस्या करने लगे।
बिना कुछ खाये,पिये वे बहुत कमजोर हो गई थे, वे जमीन पर गिर पड़े।जिसके बाद एक लड़की ने उन्हें पानी पिलाया और चावल खिलाया।उसके बाद उन्हें ये महसूस किया
किसी तरह भौतिक बाधा ओ में रहने से वह आध्यात्मिक लक्ष्यों को प्राप्त नही कर पायेंगे।उसके बाद सिद्धार्थ ने पीपल के पेड़ नीचे ध्यान करना शरू किया।49 दिनों के बाद आखिरकार उन्हें शुद्ध ज्ञान की प्राप्ति हुई,वो दिन था वैशाखी पूर्णिमा का दिन।
एक सुजाता नाम की स्त्री अपने पुत्र प्राप्ति की खुशी में सोने के थाल में खीर लेकर पीपल के वृक्ष नीचे बैठे सिद्धार्थ को ख़िर खिलायी और कहा-"कि जैसी मेरी मनोकामना पूर्ण हुई,उसी तरह आपकी मनोकामना पूर्ण हो।वर्षो की कठिन साधना के बाद बोधगया(बिहार)में बोधिवृक्ष के निचे ज्ञान हुवा।उसी रात सिद्धार्थ को बौधि ज्ञान हुवा।
ज्ञान प्राप्त करने के बाद सिद्धार्थ बुद्ध के नाम से जानने लगे।बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश सारनाथ में दीया, जिसे बौद्ध ग्रंथों में धर्मचक्र प्रवर्तन कहा गया।बुद्ध ने अपने उपदेश जनसाधारण की पाली भाषा मे दिया।बुद्ध ने अपने उपदेश कौशल, वैशाली, कौशाम्बी औऱ अन्य राज्य में दिये।बुद्ध के मुख्य शिष्य उपाली व आंनद थे।बुद्ध के प्रसिद्ध अनुयायी शासकों में बिम्बिसार, प्रसेनजित और उदयन थे।भगवान बुद्ध ने अपने संघो में सभी प्रकार के लोगों को स्थान दिया, बिना कोई भेदभाव सभी प्राणियों को  अपने संघ में सामिल किया।गौतम बुद्ध की मृत्यु 483 ईशा पूर्व में कुशीनारा में हुई,उस समय उनकी आयु 80 वर्ष की थी।बौद्ध धर्म मे इसे महापरिनिर्वाण कहते है।
नमस्कार।

Saturday, 10 August 2019

Element contemplation333: कर्म

Element contemplation333: कर्म: ईश्वर एक प्रकृति है...कुदरती संपत्ति देवी देवता है...जहां अच्छा पर्यावरण वातावरण होगा वहाँ सुख शांति आंनद का अनुभव होगा..... ॐ नमः शिवाय......

कर्म

ईश्वर एक प्रकृति है...कुदरती संपत्ति देवी देवता है...जहां अच्छा पर्यावरण वातावरण होगा वहाँ सुख शांति आंनद का अनुभव होगा..... ॐ नमः शिवाय........मनुष्य का स्वभाव कब ,कहा बदल जाये,उनका पता नही चलता..... आज जो अच्छे विचारों से जीवन जी रहा है...कल वो विपरीत विचारो से जीने लगें .....तो उनको हम देवता नही कह सकते......... देवता वो है जैसे, पानी,अग्नि,हवा जो अपने गुण कभी नही छोड़ते इसलिए हम उसे देवता कहते है.......मनुष्य को शरीर,मन और आत्मा का विकास करना चाहिये... ध्यान, योग, कसरत से,योग्य आहार विहार से,अच्छे आचरण से........इससे.... मनुष्य देवता तो नही बन सकता पर महानता के शिखरों तक जरूर पहोच सकता है................देवी देवता एक पद है,स्थान है ,वहां परमात्मा ही पहोच सकता है.... जो आत्मा परमात्मा बनने के लायक है वो देवी देवता के पद स्थान पर जरूर पहोंचेगा.......कर्म पर ही आधारित है अंनत विश्व ,जैसा कर्म होगा फल भी वैसा होगा......भगवान ने अन्नत विश्व बनाया..... अगर मनुष्य चाहे तो अच्छे कर्म करके देवता बन सकता है(जैसे राम, कृष्ण).....मनुष्य चाहे तो बुरे कर्म करके वो राक्षस भी बन सकता है(जैसे रावण, कंस,हिरण्यकश्यप)......राम,कृष्ण, रावण सब ने शिव कि ही भक्ति ,तपस्या की थी.....लेकिन कृष्ण और राम ने अपने अच्छे कर्म से देवता बने...और रावण अपने बुरे कर्म और आचरण से राक्षस बने......कर्म के फल का सिंद्धांत हमेशा मौजूद है .




Monday, 5 August 2019

Element contemplation333: कुदरती आपत्ति

Element contemplation333: कुदरती आपत्ति: कुदरती आपत्ति क्या है?और क्यो आती है कुदरती आपत्ति?......इसका एक ही जवाब है कुदरती संपत्ति का नुकसान....जहाँ कुदरती संपत्ति का नुकसान हुव...

कुदरती आपत्ति


कुदरती आपत्ति क्या है?और क्यो आती है कुदरती आपत्ति?......इसका एक ही जवाब है कुदरती संपत्ति का नुकसान....जहाँ कुदरती संपत्ति का नुकसान हुवा हो वहाँ कुदरती आपत्ति आती है...जंगल, वन्य प्राणी, वन्य पक्षी, पहाड़,नदी,सरोवर, समुद्र, सूक्ष्म जीव, छोड़,वृक्ष आदि सभी जीव पृथ्वी की कुदरती संपत्ति है...मनुष्य ने अपने स्वार्थी प्रवृत्ति से जाने अनजाने में कुदरती संपत्ति का नुकसान किया है,खास करके वृक्ष का भारी मात्रा में नुकसान किया...आज पृथ्वी पर ग्लोबल वार्मिंग का खतरा दिन प्रति दिन बढ़ रहा है,ग्लोबल वार्मिंग के खतरे का जिम्मेदार आज के समय के मनुष्य ही है.....कुदरत ने हमे इस पृथ्वी के लिये जो कुदरती संपत्ति उपहार में दी है,उस संपत्ति का बहोत नुकसान आज के समय मे हो रहा है.....आज मनुष्य भौतिक उपलब्धि के पीछे भाग रहा है, लेकिन आनेवाली पेढ़ी बगैर अच्छे वातावरण, पर्यावरण से कैसे तंदुरुस्त जीवन जी पायेगी?.........आज के समय मे इस पृथ्वी के मनुष्य को अपनी आनेवाले पेढ़ी के लिये कुदरती संपत्ति की रक्षा करनी चाहिए...........आज पूरे विश्व के अलग अलग देश में अलग अलग कुदरती आपत्ति हो रही है....किसी जगह भूकंप तो किसी जगह सुनामी,किसी जगह भारी बारिश तो किसी जगह बहोत ही कम बारिश, किसी जगह पर्यावरण के तापमान में गर्मी का प्रणााम खूब बढ़ता है तो किसी जगह तापमान कम होना.......सच कहे तो कुदरती संपत्ति के बगैर मनुष्य के साथ दूसरे पशु ,पक्षिओ का जीवन का पनपना या जीवन जीना असंभव हे...जल  जीवसृष्टि की प्यास बुझाता  हे और वृक्ष हवा के साथ छाव,लकड़ी,फल,फूल,अनाज और सब से जरुरी ऑक्सीजन देता हे.. हमे मनुष्य को कुदरत का दिया हुवा उपहार को नुकशान नहीं पहुँचाना  चाहिए...पृथ्वी पे आज के समय मे जंगल कम हो रहे हे ,उनके साथ गावो का शहरीकरण हो रहा हे...इस वजह से इस पृथ्वी पर वृक्ष धीरे धीरे कम हो रहे हे... इनका नुकशान हमारी आनेवाली पेढ़ी को होगा... इस पृथ्वी पर ग्लोबल वॉर्मिक नाम का भयंकर खतरा बढ़ रहा हे ,जो आगे आनेवाले समय में इस पृथ्वी पे जीवसृष्टि का पनपना मुश्किल कर देंगा...मनुष्य को अब समझना  होगा की इस पृथ्वी पर जीवसृष्टि के विकास के लिए कुदरती संपत्ति कितनी आवश्यक हे...........नमस्कार

Wednesday, 31 July 2019

Element contemplation333: ओमकार परमेश्वर

Element contemplation333: ओमकार परमेश्वर: जब अनन्त विश्व मे कुछ भी नही था, वो जो कुछ भी नही था वो भी में(ॐ) ही था....आज अनन्त विश्व मे जो कुछ भी है,वो जो जो कुछ भी है वो भी में(ॐ)...

Element contemplation333: होली

Element contemplation333: होली: →होली शब्द सुनते ही कई लोगो को शोले फिल्म का डायलॉग याद आ जाता हे।शोले फिल्म में डाकू गब्बर सिंग बार बार यह कहता हे,होली कब हे? या कब...

Element contemplation333: आध्यात्मिकता

Element contemplation333: आध्यात्मिकता: नमस्कार... ॐ नमः शिवाय.....पहले के जमाने मे दूसरे देशों के लोग आध्यात्मिक ज्ञान की तलाश में भारत का प्रवास करते थे.....भारत देश पहले आध्यात...

Tuesday, 30 July 2019

आध्यात्मिकता

नमस्कार... ॐ नमः शिवाय.....पहले के जमाने मे दूसरे देशों के लोग आध्यात्मिक ज्ञान की तलाश में भारत का प्रवास करते थे.....भारत देश पहले आध्यात्मिक ज्ञान,योग विज्ञान से विश्व मे प्रचलित था, जो और किसी बात से मूल्यवान बात थी....हमारे आधुनिक लोग ने योग और आध्यात्मिक ज्ञान को महत्व नही दिया....... भूतकाल में बुद्ध, यु ऐन संग जैसे लोग भारत आये थे ,आध्यात्मिक ज्ञान की तलाश में,बुद्ध और यू ऐन संग ने भारत मे आध्यात्मिक ज्ञान लिया... बाद में यु ऐन संग चीन में वापस जाकर पूरे चीन में आध्यात्मिक ज्ञान का प्रचार किया.......बुद्ध ने भी आध्यात्मिक ज्ञान का अपने शिष्यों के जरिये पूरे विश्व मे प्रचार किया..............भारत देश आध्यात्मिक देश है......पर आधुनिक लोग हमारे भारत देश की आध्यात्मिक संस्कृति को भुलाते जा रहे है......योग,जप,तप,व्रत,ध्यान,नीति नियम ये सब खोज भारत देश की संस्कृति की है........मन की स्थिति पर निर्भर है आध्यात्मिक ज्ञान...........भले आध्यात्मिक ज्ञान आज अलग अलग भाषा मे है,जो पहले एक भाषा मे था.......लेकिन आध्यात्मिक ज्ञान भाषाकीय विषय नही है...आध्यात्मिक विज्ञान एक क्रिया है....जैसे योग,ध्यान, तप,जप,व्रत ...जप,तप,व्रत , योग, ध्यान से मनुष्य की शरीर, मन और आत्मा की शक्ति जागृत होती है..लेकिन अभ्यास प्रतिदिन होना जरूरी है....जिंदगी सरल है...सरल विचारो से जीना चाहिए.... और व्यवहार भी सरल रखना चाहिए..हर इंसान के जीवन का समय बहोत ही सीमित होता है...बचपन,जवानी,पारिवारिक जीवन, वृद्धा अवस्था...ये चार अवस्था मे से पहले तीन अवस्था का समय एक बार चला गया दोबारा लॉट के नही आता....इसलिए अपने समय को पहचान के हर मनुष्य को चलना चाहिए.....समय का सही उपयोग करना चाहिए....अच्छे अभ्यास और स्वाध्याय, ध्यान ,योग से...ये सब शब्द उच्च लेवल के शब्द है.….आध्यात्मिकता खोजने और महसूस,अनुभव करने का विषय है.....सही तरीके से,नीति नियम से.....सही नीति नियम अपनाये तो परमात्मा अपने अंदर ही मिल जाता है.......

Thursday, 18 July 2019

ओमकार परमेश्वर

जब अनन्त विश्व मे कुछ भी नही था, वो जो कुछ भी नही था वो भी में(ॐ) ही था....आज अनन्त विश्व मे जो कुछ भी है,वो जो जो कुछ भी है वो भी में(ॐ) ही हु.... में(ॐ) ही आदि हु, में(ॐ) ही अनन्त हु........ ॐ नमः शिवाय......में(ॐ) ही त्रिदेव हु........में ही (ओम) सृष्टि का रचियता, में ही (ओम) पालनकर्ता और में ही (ओम) संहारकर्ता हु................में (ओम) ही 33 कोटि देवी देवता हु......... अनन्त विश्व की हर व्यवस्था मुझसे(ओम) से हे........में (ओम) अनन्त विश्व के कण कण में(ओम) हु....... सभी तत्वों में मे(ओम) ही हु..... अनन्त विश्व (ओम) मुझमे में और में (ओम) अनन्त विश्व मे.........अनन्त विश्व को चलाने वाला और नियंत्रण कर्ता में (ओम) ही हु.......(ओम) में ही जन्म,जीवन और मृत्य हु..........(ओम)में ही आत्मा हु और परमात्मा भी में (ओम) ही हु............अंत मे अनन्त विश्व मे जो कुछ भी है वो में (ओम) ही हु............जो मुझे(ओम) पा लेता है,समझ लेता है उसे कुछ और पाने की या समझने की जरूरत नही है,क्योकि (ओम) में ही अनन्त ज्ञान और अंनत उर्जा है............हर जीव में ओमकार ध्वनि की ऊर्जा है,उसे समझने ने के लिए,अनुभव करने के लिये ध्यान की जरूरत होती है.............ध्यान, योग से ही हर मनुष्य ओमकार ध्वनि की ऊर्जा को पा सकता है.........मनुष्य को ध्यान योग शिखवा चाहिए...ध्यान योग से शरीर, मन और आत्मा का एक अच्छा चरित्र निर्माण होगा.......... ॐ नमः शिवाय

Friday, 12 April 2019

Element contemplation333: परमात्मा की माया

Element contemplation333: माया: एक बार पांडवो में   धनुर्धर अर्जुन ने भगवान श्री कृष्णा से बातो ही बातो पूछ लिया , '' भगवन ये माया आखिर हे क्या ? में माया के बारे में...

परमात्मा की माया

एक बार पांडवो में  धनुर्धर अर्जुन ने भगवान श्री कृष्णा से बातो ही बातो पूछ लिया , '' भगवन ये माया आखिर हे क्या ? में माया के बारे में जानना चाहता हु। उस समय भगवान श्री कृष्णा अर्जुन के प्रश्न से थोड़ा हसे और भगवान श्री कृष्णा अर्जुन से कहा की '' हे अर्जुन माया को जानने की जो इच्छा हे तुम्हारे में  वो इच्छा में सही समय आने पर पूर्ण करुगा ''।→उसके बाद समय बीतता गया। कुछ समय बीत जाने के बाद अर्जुन भी माया को समझने की बात भूल गया था। लेकिन  उनको पता था की भगवान श्री कृष्णा उनको माया क्या हे ?उनका ज्ञान जरूर देंगे। →एक दिन की बात हे ,भगवान श्री कृष्ण सुबह सुबह अर्जुन से  कहने लगे की ,हे अर्जुन मुझे बहोत ही भूख लगी हे ,तुरंत ही भोजन की व्यवस्था की जाय I  लेकिन उस वक्त खाना बना नहीं था ,इसलिए अर्जुन ने श्री कृष्णा को कहा ,भोजन के लिए थोड़ा समय लगेगा भगवन। और अर्जुन भगवान श्री कृष्णा से कहा ,की जबतक भोजन बनके तैयार हो जाये तब तक हम नदी में स्नान करके आ जाते हे।→उनके बाद भगवान श्री कृष्णा साथ में अर्जुन नदी की और स्नान करने चल पड़े। नदी में स्नान करते समय अर्जुन भगवान श्री कृष्णा से शर्त लगाते हे  की पानी में ज्यादा समय कौन रहता हे। भगवान श्री कृष्णा अर्जुन की दी हुई शर्त स्वीकार कर  लेते हे। और  भगवान श्री कृष्णा और अर्जुन दोनों पानी में डुबकी लगाते हे। →अर्जुन अपने प्रयास से पानी में डुबकी लगाई ,कुछ समय बाद वो पानी से बहार निकला ,पानी से बहार निकलने के बाद अर्जुन आश्चर्य चकित हो गया ,अर्जुन के आसपास कोई नहीं था। न नदी ,न कृष्णा ,न कोई नदी का किनारा ,न अपनी राजधानी हस्तिनापुर ,वो अब कोनसे स्थान पर हे वो भी अर्जुन को मालूम नहीं।  अपने आपको अकेला महसूस पा कर उस स्थान पर अर्जुन अकेला ही घूमने फिरने लगा। कुछ समय के अंतर के बाद अर्जुन को थोड़े दूर एक विशाल नगर दिखा। अर्जुन शीग्रता से उस नगर की और चल पड़ा। नगर के द्वार तक पहोचने के बाद अर्जुन की मुलाकात उस नगर के प्रधानमंत्री और सेनापति  के साथ  हुई। सेनापति और प्रधानमंत्री अर्जुन को राजदरबार में ले गई।→ राजदरबार में पहोचते ही प्रधानमंत्री ने अर्जुन के सामने एक दुखभरा निवेदन दिया। की हे श्रीमान हमारे महाराज बीती हुई  रात को मृत्यु हो गई हे ,उनका कोई उत्तराधिकारी नहीं हे। ये राज्य का नियम हे की राजा  अगर मृत्यु हो जाये और उनका उत्तराधिकारी कोई न हो, तो उस समय प्रातः काल जो मनुष्य राज्य में पहला दिखे उसे  राजा बनाया जाता हे। अर्जुन कुछ भी कह न सका,और अर्जुन को उस राज्य का राजा बनना पड़ा। उस समय अर्जुन को भगवान श्री कृष्णा और अपने राज्य हस्तिनापुर की बहोत याद आयी ,पर अर्जुन कुछ करे तो क्या करे? अर्जुन विवस था ,इस विवशता के साथ प्रधानमंत्री के आग्रह से अर्जुन की सादी भी हो गई। और अर्जुन राजा बनके सुंदर पत्नी  के साथ  राज करने लगा। समय बीतने के बाद अर्जुन की पत्नी को एक के बाद एक तीन पुत्र भी हो गई। अर्जुन का परिवार और राज्य बहोत अच्छी तरह से चलने लगा।→थोड़े कुछ वर्ष के बाद ,दुर्भाग्य के वश अर्जुन की पत्नी की मृत्यु हो गई। महारानी के शब को श्मशान घाट ले जाया गया। अर्जुन और राज्य की प्रजा बहोत दुखी थी। अर्जुन जब श्मशान घाट में देखा तो उनको बहोत आश्चर्य हुवा ,कारन वो था की श्मशान घाट में दो चिताओका निर्माण हुवा था। अर्जुन कुछ सोचता उससे पहले महारानी का शब को एक चिता पे रख दिया। और दूसरी चिता पे अब अर्जुन को बिठाना था। अर्जुन को इस बात का जब पता चला की दूसरी चिता पे उनको जलाया जायेगा ,तो अर्जुन उस बात का विरोध करने लगा। उस समय  प्रधान   और प्रजा अर्जुन को समझाने  लगे की ,हमारे राज्य का नियम हे की पत्नी के मृत्यु के बाद पतिको पत्नी  के साथ जिन्दा जलाया जाता हे।→प्रजा की बात सुनकर अर्जुन प्रजा को बहोत समझाने का प्रयास किया की ये सब नियम गलत हे। अर्जुन प्रजा को बहोत समझाया पर कुछ परिणाम न मिला। अब अर्जुन बचने के लिए युक्ति सोचने लगा ,और एक युक्ति समज में आयी। अर्जुन ने अपनी प्रजा को कहा की आपकी बातो से मुझे कोई चिंता नहीं हे ,पर मुझे पहले नदी में एक बार स्नान करने की अनुमति दी जाय। अपने आप  को बचाने के प्रयास के साथ उस समय अर्जुन श्री कृष्णा को बहोत ही याद करने लगा।→अर्जुन जब स्नान करके लिए नदी में डुबकी लगाई और पानी में कुछ ज्यादा समय रहने का प्रयास किया। उस समय प्रजा की आवाज अर्जुन को भयभीत कर रही थी। उनको पकड़ो  पकड़ो कही भाग न जाए ऐसी प्रजा की आवाज    अर्जुन को सुनाई देने लगी। किन्तु परन्तु अर्जुन पानी के अंदर  आखिर कितने समय तक रह सकता हे। और अर्जुन पानी के अंदर से अपना मुख बहार निकाला और आखिर सोचने लगा की अब तो मरना निश्चित हे।→जैसे ही अर्जुन पानी के अंदर से बहार निकलता हे ,और अर्जुन नदी के आसपास देखा तो उनके मुँह से ये सवाल निकल गया ,ये क्या हे ?नदी के आसपास न तो प्रजा थी ,न रानी का शब ,न श्मशान घाट। और कुछ ज्यादा समय  अर्जुन सोचता उसी  समय भगवान श्री कृष्णा पानी के अंदर से बहार निकलते हे ,और अर्जुन से कहते हे की हे अर्जुन तुम हार गये और में जित गया।→अर्जुन  बहोत ही आश्चर्य में पड़ गया। सालो तक राज किया।  साथ में पत्नी ,पुत्रो ,प्रजा ये सब क्या था ?भगवान श्री कृष्णा अर्जुन की परेशानी जानने के बाद  भी  बार बार यही बात दोहराते थे की ,अर्जुन आप शर्त हार गये और में शर्त जित गया। श्री कृष्णा अर्जुन से कहने लगे बहोत स्नान कर लिए ,अब घर जाते हे,मुझे बहोत भूख लगी हे। घर पहोचते ही भगवान श्री कृष्णा मंद मंद मुस्काते हुई  भोजन ग्रहण कर रहे थे  और अर्जुन अभी भी गहरी सोच में था की ये सब क्या था ?→थोड़ी देर भोजन करने के बाद अर्जुन बहोत ही दुखी था। अर्जुन ने श्री कृष्णा को अपनी आपबीती सुनाई। उसके बाद भगवान श्री कृष्णा  मंद मंद मुस्काते हुई  अर्जुन से कहते हे ये सब माया हे। ये सब मेरी माया का दर्शन था। अर्जुन श्री कृष्णा से कहता हे की आपको मुझे अपनी माया ही दिखानी थी  तो पहले मुझे एक बार कह तो दिया होता ,में कैसे मान लू की ये सब माया थी ? →श्री कृष्णा फिर मुस्काते हे और अर्जुन से कहते हे की ,हे अर्जुन थोड़ी क्षण के लिए फिर से अपनी आँख बंध कर दे ,तुजे फिर से मेरी माया का दर्शन हो जायेगा। अर्जुन जैसे ही आँख बंध करता हे वो स्वयं को स्मशान घाट पे पाया महसूस करता हे। और अर्जुन को पकड़ो कही भाग न जाये ऐसी प्रजा की आवाज सुनाई देती हे। अर्जुन फिर से  गभराह जाता हे और आँख खोल देता हे तब श्री कृष्णा  फिर मंद मंद मुस्काते हे।→अर्जुन बहोत डर जाता हे और कहता हे की भगवान मुझे आपकी माया का दर्शन नहीं करना हे ,मुझे आपकी शरण चाहिए। भगवान श्री कृष्णा भी अर्जुन के मस्तक पे हाथ रखकर आशीर्वाद देते हे और साथ में ये भी कहते हे की में सदा अपने भक्तो के साथ ही रहता हु ,में कभी भक्तो का साथ नहीं छोड़ता। जय श्री कृष्णा

Tuesday, 2 April 2019

kartikey45: April fool

kartikey45: April fool:  मार्च महीना का जैसे ही अंत होता हे और उसके बाद जैसे ही अप्रैल महीना का आरम्भ होता हे उस  दिन लोग अपने दोस्त और रिस्तेदारो से कुछ ऐसी बात...

April fool

 मार्च महीना का जैसे ही अंत होता हे और उसके बाद जैसे ही अप्रैल महीना का आरम्भ होता हे उस  दिन लोग अपने दोस्त और रिस्तेदारो से कुछ ऐसी बात कहते हे , जो उनके बारे में ही होती हे , वो बात सुनकर कई लोगो को गुस्सा आ जाता हे ,कुछ लोग आनंद या ख़ुशी से झूम उठते हे। लेकिन बाद में उन सभी लोगो को पता चलता हे की हमें कही हुई बातो से हमें मुर्ख बनाया जा रहा हे ,तो वो लोग  भड़क जाते हे। वो लोग जब शिकायत करते हे हमे कहि हुई बात जो एक  झूठ हे।  तब उनको जवाब मिलता हे ......अप्रैल फूल .......... अप्रैल के पहली तारीख का दिन अप्रैल फूल दिन के नाम से जाना जाता हे। उन दिन कुछ लोग अपने दोस्तो और रिस्तेदारो से मजाक करते  हे  ओर उस दिन को आनंद ,ख़ुशी से मनाते हे। ..........बॉलीवुड की एक पुरानी हिंदी फिल्म हे , उसमे  अप्रैल फूल का एक  कॉमेडी गीत भी हे .........                                                                                                                                                                                                                                                          April fool बनाया तो उनको गुस्सा आया
तो मेरा क्या क़सूर ज़माने का क़सूर
जिसने दस्तूर बनाया...
April Fool बनाया तो उनको गुस्सा आया
तो मेरा क्या क़सूर ज़माने का क़सूर
जिसने दस्तूर बनाया
April Fool बनाया…

Sunday, 31 March 2019

kartikey45: कुदरती संपत्ति

kartikey45: कुदरती संपत्ति: →आज के समय में इस पृथ्वी पर मनुष्य सब से विकसित प्राणी कहलाता हे ,क्योकि  इस पृथ्वी पर मनुष्य जैसी शारीरिक और मानसिक  रचना अन्य प्राणी में ...

Thursday, 28 March 2019

कुदरती संपत्ति

→आज के समय में इस पृथ्वी पर मनुष्य सब से विकसित प्राणी कहलाता हे ,क्योकि  इस पृथ्वी पर मनुष्य जैसी शारीरिक और मानसिक  रचना अन्य प्राणी में नहीं हे। कुदरत ने हम मनुष्य को बहुत सारी वस्तुएँ उपहार में दी हे, कुदरत के दिए उस उपहार को हम कुदरती संपत्ति भी कह सकते हे। कुदरती प्रकृति के सांनिध्य  में रहकर समग्र जीवसृष्टि फलती-फूलती हे। उसका रसास्वाद कर जीवन व्यतीत करती हे।  मनुष्य को जीवन जीने के लिए भौतिक सुख सुविधा के साथ हवा ,पानी ,आग या अग्नि,खुराक और पहनने के लिए वस्त्र की जरुरत पड़ती हे ,उससे  विपरीत अन्य  जिव जैसे की वन्य प्राणिओ ,जिव-जंतु और पंछीओ  को वृक्ष, खुला आकाश ,जंगल ,नदी,तलाव,समुद्र ,पहाड़ जैसे कुदरती प्राकृतिक स्थान की जरुरत रहती हे। कुदरत ने प्रचुर मात्रा में इन सभी का आविष्कार किया हे। परंतु  आधुनिक विज्ञानं की खोजो की तरह मनुष्य के बढ़ते चरण से पृथ्वी पर इन कुदरती संपत्तियों का संतुलन बिगड़ गया हे। हमारी जीवसृष्टि के लिए कुदरती संपत्ति का होना बेहद जरुरी हे,खास तोर पे वृक्ष और पानी का महत्व बहोत हे। जीवसृष्टि के लिए जल और वृक्ष एक कुदरती  शक्ति हे या बल हे ,क्योंकि वृक्ष से जीवसृष्टि को ऑक्सीजन मिलता हे और जल से तो जीवसृष्टि  अपनी सभी आवश्यकताएँ  पूर्ण कर सकती हे। पानी  का उपयोग वन्य प्राणी,पशु -पक्षी और मनुष्य पानी पिने के लिए करता हे।मनुष्य जिव को पानी की जरुरत अन्य वन्य पशु ,पक्षी  से कुछ ज्यादा हे ,मनुष्य पानी पिने के साथ,खेतो के लिए,औद्योगिक कारखाने चलाने के लिए और घरेलु रसोई बनाने के लिए पानी बहोत जरुरी हे। सोचो अगर इस पृथ्वी पर वृक्ष,जल या पानी नहीं होता तो ये जीवसृष्टि नहीं होती। पानी के बगैर हमे खाने के लिए अनाज और पहनने के लिए वस्त्र नहीं मिलते। सच में कुदरती संपत्ति के बगैर जीना असंभव हे ।→सच कहे तो कुदरती संपत्ति के बगैर मनुष्य के साथ दूसरे पशु ,पक्षिओ का जीवन का पनपना या जीवन जीना असंभव हे। जल  जीवसृष्टि की प्यास बुझाता  हे और वृक्ष हवा के साथ छाव,लकड़ी,फल,फूल,अनाज और सब से जरुरी ऑक्सीजन देता हे। हमे मनुष्य को कुदरत का दिया हुवा उपहार को नुकशान नहीं पहुँचाना  चाहिए। पृथ्वी पे आज के समय मे जंगल कम हो रहे हे ,उनके साथ गावो का शहरीकरण हो रहा हे। इस वजह से इस पृथ्वी पर वृक्ष धीरे धीरे कम हो रहे हे। इनका नुकशान हमारी आनेवाली पेढ़ी को होगा। इस पृथ्वी पर ग्लोबल वॉर्मिक नाम का भयंकर खतरा बढ़ रहा हे ,जो आगे आनेवाले समय में इस पृथ्वी पे जीवसृष्टि का पनपना मुश्किल कर देंगा। मनुष्य को अब समझना  होगा की इस पृथ्वी पर जीवसृष्टि के विकास के लिए कुदरती संपत्ति कितनी आवश्यक हे।                                                                                                 

Friday, 22 March 2019

खोज

         भगवान शब्द सुनते ही एक आध्यात्मिक शांति का अनुभव मन में अंकुरित होता हे।इस समग्र ब्रह्माण्ड को किस ने बनाया हे ?ये सवाल पृथ्वी पे हर व्यक्ति को होता हे,लेकिन अभी तक मनुष्य पुरे ब्रह्माण्ड को नहीं समज सका  तो भला उनके सर्जनहार भगवान को कैसे समझेगा?ब्रह्माण्ड अनंत हे उनको समझना इतना आसान नहीं हे ,वैसी ही बात  भगवान पे भी लागु होती हे। भगवान  और ब्रह्माण्ड शब्द दोनों एक दूसरे से जुड़े हे ये हम कह सकते हे। इस पृथ्वी पे वैज्ञानिक लोग ब्रह्माण्ड को खोजने में और समझने में लगे हुई हे ,और ब्रह्माण्ड को समझने में सफल भी हुई हे। इसी तरह आध्यात्मिक लोग भी  भगवान को खोजने और समझने में अंशतः सफल भी हुई हे।

Wednesday, 20 March 2019

होली


→होली शब्द सुनते ही कई लोगो को शोले फिल्म का डायलॉग याद आ जाता हे।शोले फिल्म में डाकू गब्बर सिंग बार बार यह कहता हे,होली कब हे? या कब हे होली?शोले फिल्म में होली त्यौहार का एक  मधुर गीत दर्शाया गया हे ,उस गीत में वीरू ,बसंती और पूरा गांव शामिल होकर,''होली के दिन दिल खिल जाते हैं रंगों में रंग मिल जाते हैं,गीले शिकवे भूल के दोस्तों दुश्मन भी गले मिल जाते हैं'' गीत में बहोत नाचते हे गांव के लोग  या यु कहे तो होली का उत्सव मनाते  हे।→ये बात हुई फ़िल्मी होली की लेकिन भारत देश में अलग अलग राज्य के अलग अलग गांव के लोग भी होली का उत्सव  बड़े ख़ुशी, आनंद,उल्लास,जोश से मनाते हे। भारत देश के भिन्न भिन्न राज्य के लोग अपनी अपनी संस्कृति के अनुसार होली का त्योहार मनाते हैं।→भारत देश के लिए होली एक धार्मिक और आध्यात्मिक उत्सव हे। होली का त्यौहार देवी शक्तिओ का आसुरी शक्ति पर विजय का त्यौहार भी कह सकते हे।→पुरातन समय में हिरण्यकश्यप  नाम का असुर था ,वो देवी-देवताओ का दुश्मन था,खास करके भगवान  नारायण को परम शत्रु वो मानता था। दुर्भाग्य के वश असुर हिरण्यकश्यप के वहाँ एक पुत्र पैदा हुवा ,उस पुत्र का नाम प्रहलाद था। प्रहलाद जब बड़ा हुवा तो वो भगवान विष्णु की  भक्ति करने लगा। ये बात जब हिरण्यकश्यप को पता चली तो वो अपने पुत्र पे क्रोधित हो उठे।   हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद को मृत्युदंड की सजा सुना दी। हिरण्यकश्यप की बहन होलिका आयी  ,उसको भगवान ब्रह्मा ने आग में न जलने का वरदान दिया था। वो आग में प्रहलाद  को लेकर बैठ  गई ,लेकिन प्रहलाद  की विष्णु भक्ति के आगे उनकी शक्ति नहीं चली, होलिका की मृत्यु हो गई  और प्रहलाद बच जाता हे।हिरण्यकश्यप के सैनिक ले जाते हे प्रहलाद को मारने को लिए ,लेकिन प्रहलाद की विष्णु भक्ति इतनी प्रखर थी की अग्नि उसे जला न सकी ,गरम तेल भी उसे जला न सका , पहाड़ से भी फैका था प्रहलाद को तो भी भगवान विष्णु की भक्ति ने प्रहलाद को बचा लिया। अंत में भगवान विष्णु साक्षात प्रकट होते हैं नरसिंह अवतार लेके  असुर हिरण्यकश्यप को मार देते हे और भक्त प्रहलाद को बचा लेते हे।ये कहानी हुई न असत्य पर सत्य की विजय,प्रहलाद की विष्णु भक्ति के आगे आसुरी शक्ति हार गई। उस समय के लोग प्रहलाद को जीवित देखकर आनंद उल्लास से नाचने लगे और उत्सव मनाने लगे। आगे जाके ये उत्सव होलिका दहन  के नाम से  जाने लगा। 

कविता पाठ

में बहुत खुश हु। तो भी में खुश नहीं हु। में बहुत दुखी हु। तो भी में दुखी नही हु। में बहुत परेशान हु। तो भी में परेशान नही हु। में बहुत आनंद ...